किसी भी भवन का दक्षिण-पश्चिम हिस्सा जिसमें पैशाच वीथी के पितृ,दौवारिक,सुग्रीव,मृष, भृंगराज पद सम्मिलित होते हैं भवन का बहुत ही महत्वपूर्ण और शक्तिशाली भाग होता है शास्त्रों में इन पदों में रसोईघर अर्थात किचन को अनुपयुक्त बताया है मेने वास्तु विश्लेषणों के अपने निजी अनुभव में देखा है जिन भवनों के इस भाग में किचन बने होते हैं ऐसे भवनों की महिलाएँ घर के पुरुषों पर अधिक प्रभावी/Dominant रहती हैं। ऐसे घरों में आर्थिक अस्थिरता रहती है घर का कम से कम एक बेटा अपनी योग्यता अनुसार पद प्रतिष्ठता प्राप्त नही कर पाता है जबकि उसमे अच्छी काबिलियत होती है,घर मे किसी एक महिला को एड़ी से कमर तक के हिस्से में दर्द अकड़न ऐंठन आदि बनी रहती है साथ ही 15 सालों में किसी एक महिला के गर्भाशय की शल्य क्रिया होने की प्रबल संभावना होती है,ऐसे घर के मुखिया पुरुष का या कम से कम घर के एक पुरुष का बाहर किसी महिला से अनैतिक संबंध का होना मेने अपने अनुभवों में देखा है।उक्त किचन वाले भवन की महिला आंतरिक तनाव,अवसाद से ग्रस्त रहती है। कुछ केस में इस दिशा के किचन में घर की किसी एक महिला के साथ असामयिक बड़ी दुर्घटना होते भी मेरे द्वारा अनुभव की गई है (वो भी भवन में रहने आने के 13 से 15 साल के भीतर)।इन्ही सब नकारात्मक गुणों के कारण शास्त्रों में इस दिशा में रसोई घर को वर्जित बताया गया है। उक्त सब दुर्गुणों के बावजूद इस दिशा के किचन की एक विशेषता है यहाँ बना खाना बेहद चटपटा और स्वादिष्ट बनता है और यहाँ बना साधारण खाना भी तारीफ का पात्र बनता है ।
उक्त लेख भारतीय वास्तु शास्त्र के मूलभूत सिद्धांत,मेरे अनुभव और विश्लेषण के आधार पर है इन अनुभवों को मानना न मानना व्यक्ति विशेष का अपना निजी नजरिया है
वास्तुविद डॉ गौरव गुप्ता
संस्थापक:वास्तु दुनिया ग्रुप
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