वास्तु शास्त्र और उसका परिस्थिति अनुसार बदलाव

वास्तु ऊर्जा का प्रभाव परिस्थित अनुसार बदलता है कॉलोनी डेवेलोप होने से छोटे मकान बनने तक कैसे परिवर्तन आता जाता है समझने का प्रयास करते हैं ।
जब कोई डेवलपर किसी कॉलोनी के लिए जमीन खरीदता है तभी से इस जमीन की वास्तु ऊर्जा का प्रभाव उस डेवलपर पर शुरू हो जाता है अर्थात एक जमीन पर शास्त्र के जो जो नियम लागू होते हैं उस डेवलपर पर कार्य करना शुरू कर देते हैं जैसे जमीन का आकार, ढलान,शल्य,जमीन पर छोटे बड़े टीले, जमीन में मौजूद कुँए बोरिंग आदि जलाशय,कोई जिओपेथी ऊर्जा या उसका नोडल पॉइंट,जमीन में मौजूद कोई मंदिर मजार वृक्ष(पीपल,बरगद,नीम आदि),बांबी आदि की ऊर्जा आदि सबका मिलाजुला प्रभाव शुरू हो जाता है । जब इस भूमि पर डेवलपर द्वारा विकास कार्य या निर्माण शुरू किया जाता है तब निर्माण संबंधी नियम लागू होना शुरू होते जाते हैं बाउंड्री वाल से एक सीमा सुनिश्चित हो जाती है दीवार की दिशा अनुसार ऊंचाई मोटाई का प्रभाव होने लगता है मुख्य द्वार की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होती है गलत पद में मुख्य द्वार का निर्माण डेवलपर के लिए तो परेशानी पैदा करता ही है आने वाले समय मे रहवासियों पर भी इसका परिणामिक प्रभाव देखने मे मिलता है.ठीक इसी प्रकार अन्य निर्माण जैसे भूमि के ढलान,सड़कों के ढलान,सेप्टी टैंक,पानी की टंकी,गार्डन,गार्डन आदि में स्थापित सांकेतिक मूर्तियाँ,ड्रेनेज की व्यवस्था , बिजली की DP की व्यवस्था आदि सब शास्त्र अनुसार होना लाभकारी होता है यदि निर्माण में शास्त्र अनुसार दोष छोड़े जाएँ तो शुरुवाती समय मे डेवलपर संबंधित दोषों के प्रभाव में रहता है फिर जैसे तैसे जब रहवासी उसमें आने लगते हैं तब सम्पूर्ण कॉलोनी के नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव अलग अलग रहवासियों पर भाग्य अनुसार होता है रहवासी पर दो रूपों में वास्तु ऊर्जा काम करती है पहली सम्पूर्ण कॉलोनी की ऊर्जा का प्रभाव और दूसरा मुख्य प्रभाव उसके निजी प्लाट या घर का होगा यहाँ अलग-अलग परिस्थिति पर विचार किया जा सकता है ।

1.वास्तु सम्मत बनी कॉलोनी में वास्तु सम्मत बना भवन अधिकतम समृद्धि प्रदान करेगा ।
2.दोषित कॉलोनी में वास्तु सम्मत बना भवन मिलाजुला प्रभाव देगा वह निर्भर करेगा कि कॉलोनी के किस दोषपूर्ण हिस्से में उसका भवन है.
3.यदि कॉलोनी दोषपूर्ण है और निर्मित भवन भी दोषपूर्ण है तब अधिकतम परेशानी.

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