वास्तु शास्त्र और मानव जीवन

वास्तु शास्त्र पर किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए सबसे पहले वास्तु,वास्तु दोष और वास्तु शास्त्र को जानना परम आवश्यक है ।

  1. वास्तु : किसी भी प्रकार की खुली जमीन या किसी भी प्रकार का कोई निर्मित भवन जिसका आवासीय,धार्मिक या व्यावसायिक उद्देश्य से व्यक्तिगत या सामूहिक उपयोग किया जाता है वास्तु कहलाता है ।
  2. वास्तु शास्त्र : ऐसा शास्त्र जिसमे भूमि एवम् भवन में निवास और कार्य करने वाले लोगों को अधिकतम सुविधा , सुरक्षा , समृद्धि प्राप्ति के नियमो,सिद्धांतों,विधियों एवम् प्रविधियों का प्रतिपादन किया जाता है उस शास्त्र को वास्तु शास्त्र कहते हैं।
  3. वास्तु दोष : भूमि का ढलान या भवन में कोई भी निर्माण यदि अपनी निर्धारित दिशा से भिन्न या विपरीत स्थान पर किया जाता है तो उसे वास्तु दोष कहते हैं ।
    किसी भी वास्तु में निवास करने से पूर्व उसके शुभ-अशुभ फलों को जानना आवश्यक है,शुभ वास्तु में रहने से वहां के निवासियों को सुख सौभाग्य समृद्धि की वृद्धि होती है और अशुभ वास्तु में निवास करने से इसके विपरीत फल प्राप्त होते हैं । परमेश्वर ने प्रत्येक जीव जंतु को अपना आशियाना बसाने के लिए कुछ नियम प्रतिपादित किये हैं जैसे पक्षी सदियों से अपना घोसला एक जैसा बनाते आये हैं चूहें, खरगोश आदि अपना बिल एक जैसा ही बनाते आये हैं परंतु मनुष्य ने समय के साथ अपना घर बनाने का तरीका बदल दिया है जिसमे कई बार वास्तु के नियमों का उलंघन किया और परिणाम स्पष्ट है ऐसे लोगों का जीवन शारीरिक,मानसिक,आर्थिक,पारिवारिक आदि कई प्रकार की समस्याओं से घिरा हुआ देखा गया है । भारतीय वास्तु शास्त्र का मुख्य आधार पञ्च तत्व(पृथ्वी,अग्नि,जल,वायु,आकाश)नौ गृह एवम् भूमि-भवन पर मौजूद वास्तु पुरुष की सरंचना है जब इनमें किसी भी प्रकार या कारण से असंतुलन होता है तो कई प्रकार के वास्तु दोष उत्पन्न होते हैं जिनके कारण विभिन्न प्रकार के नकारात्मक प्रभाव उपयोगकर्ता परिवार के जीवन में देखने को मिलते हैं । विगत 18 साल में मेरे द्वारा कईं घरों,ऑफिसों,फैक्टरियों, हॉस्पिटल ,होटल ,रेस्टोरेंट,स्कूल , मैरिज गार्डन,बहुमंजिला भवन,व्यावसायिक काम्प्लेक्स,मंदिर आदि का विश्लेषण वास्तु के नियमों के आधार पर किया तो पाया कि जिस स्थान में वास्तु के निर्माण में वास्तु शास्त्र के नियमों का जितना अधिक पालन किया गया था वे सभी वास्तु एवं वास्तु के उपयोगकर्ता उतने ही सफल पाये गए एवं जिनमें वास्तु नियमों का जितना कम पालन किया गया वहाँ उसी अनुसार समस्याएँ देखने में आयीं । इसके अलावा जिस भूमि में शल्य दोष थे वहाँ वास्तु अनुसार निर्माण करने पर भी समस्याएँ देखि गयी अतः स्पष्ट है कि किसी भी भूमि पर निर्माण करने से पूर्व भूमि के शल्य दोषों का निवारण किया जाना चाहिए इस प्रकार सर्वप्रथम किसी भी भूमि जिस पर निर्माण किया जाना है इसका शल्य निवारण किया जाना चाहिए साथ ही जीओपेथिक स्ट्रेस को भी दूर करना चाहिए फिर निर्माण वास्तु नियमों के अनुसार करने से जीवन में अपार सुख,समृद्धि,सफलता को प्राप्त किया जा सकता है।

वास्तुविद् गौरव गुप्ता
संस्थापक: वास्तु दुनिया ग्रुप ।

ऐसी ही रोचक जानकारी के लिए हमारे फेसबुक पेज को फॉलो करें ।
www.facebook.com/vaastudunia

Share:

Enquire Now