किसी भी भूखण्ड, भवन, आफिस, फैक्ट्री आदि के मध्य स्थान को ब्रम्ह स्थान कहते हैं जो मध्य के नौ पदों से मिलकर बना होता है यहीं से सारा सृजन आरंभ होता है । वेदांत दर्शन की प्रक्रिया के अनुसार सारी सृष्टि की उत्पत्ति ब्रम्हा से हुई है, सारे विचार सारी रचना यहीं से आरंभ होती है इसी स्थान से अव्यक्त ऊर्जा व्यक्त होकर देववीथी, मनुष्य वीथी व पैशाच वीथी के रूप में वास्तु में कही गयी है ।
यह जो ब्रम्ह स्थान होता है यह किसी भी वास्तु में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है जैसे बच्चा जब माता के गर्भ में होता है तो उसे सारा पोषण उसकी नाभि में जुड़ी प्लेसेंटा कार्ड से ही मिलता है ठीक उसी प्रकार पूरे वास्तु को सारा पोषण इस नाभि या ब्रम्ह स्थान से ही मिलता है इसका सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होना , साफ-सुथरा होना, पवित्र होना आवश्यक है ।
ब्रम्हाजी का वाहन हंस है जिसमे एक विशेष गुण पाया जाता है जिसे शास्त्रीय भाषा मे नीर-क्षीर विवेक कहते हैं यह पानी और दूध को अलग-अलग कर दूध ग्रहण करने की क्षमता प्रदर्शित करता है इससे हम कह सकते हैं कि ब्रम्ह स्थान या ब्रम्हा का पद सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होने पर व्यक्ति की विवेक या ज्ञान शक्ति बलशाली होती है वह सही और गलत को अलग -अलग कर उचित निर्णय लेने में सक्षम होता है जीवन मे सही निर्णय लेकर उसको अमल में लाकर ही व्यक्ति उत्तरोत्तर प्रगति करता है। ब्रम्हाजी श्वेत वस्त्र धारण करते हैं जो शान्ति, कीर्ति, सौभाग्य, मोक्ष आदि को प्रदर्शित करता है। ब्रम्हाजी को विधि भी कहा गया है हमने कई बार सुना है वृद्धजन कहते हैं कि यह तो विधि का विधान है अर्थात यह ब्रम्हाजी का विधान है अर्थात जब ब्रम्ह स्थान शुभ होगा सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होगा तब जिस भी कार्य का आरंभ किया जाएगा वह कार्य अपनी पूर्णता को प्राप्त होगा ।
किसी भी वास्तु में ब्रम्ह स्थान को खुला-खुला होना श्रेष्ठ माना जाता है आंगन के लिए यह सर्वश्रेष्ठ स्थान है इसके अतिरिक्त इस स्थान का उपयोग सभा(हाल) कोई बड़े आयोजन के स्थल के रूप में ,पूजा स्थल के रूप में, विवाह आदि के लिए उपयोग किया जाना चाहिए, तुलसी के गमले को यहाँ रखा जा सकता है साथ ही इस स्थान का उपयोग मंदिर,लिविंग रूम, मंडप , ध्यान कक्ष, योजना कक्ष आदि के रूप में किया जा सकता है। ब्रम्ह स्थान के नौ पदों में शौचालय, सेप्टी टैंक, गंदे पानी का गड्ढा, पाइप लाइन, सीढ़ियाँ, झूठे बर्तन,चप्पल-जूते, भारी सामान, लोहे या लकड़ी के भारी फर्नीचर, भवन का कोई कॉलम, दीवार होना अशुभ परिणाम देता है ।
इस प्रकार उपरोक्त बताए गए दोष होने पर व्यक्ति सही निर्णय नही ले पाता है कार्य की प्रगति रूक जाती है। घर, आफिस, फैक्ट्री, इंडस्ट्री आदि के ब्रम्ह स्थान पर दोष होने पर कार्यों में रुकावट आकर गति रूक जाती है बनाई गई योजनाएं चालू नही हो पाती है या बीच मे कोई रुकावट आकर रुक जाती है। ब्रम्ह स्थान का दोष अनर्थकारी है इस स्थान पर दोष होने से उपयोगकर्ता परिवार में हृदय संबंधी, नाभि, पेट संबंधी घातक रोग होने की आशंका रहती है ऐसा शास्त्र का कथन है। ब्रम्ह स्थान का संबंध सृजन से भी होता है इसीलिए इस स्थान पर दोष होने पर संतान उत्पत्ति में बाधा रहती है।
दोष निवारण: इस स्थान में उपरोक्त बताए गए दोष को सबसे पहले यथा शक्ति अनुसार दूर करने का प्रयास करना चाहिए उसके बाद घर आफिस फैक्ट्री आदि के मध्य में मौजूद ब्रम्ह स्थान को सुगंधित जल, चंदन ,कमल, केसर आदि से पवित्र करना चाहिए साथ ही सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित किया जाना चाहिए तत्पश्चात शुभ चिन्हों से युक्त मंजूषा या कलश स्थापित करने का विधान शास्त्र में बताया गया है इस मंजूषा या कलश में विभिन्न रत्न, कई प्रकार की शक्तिशाली औषधियाँ(जिसे सर्व औषधि भी कहा जा सकता है), खनिज, सोना, चांदी, पारा, अलग-अलग प्रकार के सकारात्मक प्रतीक चिन्ह,क्रिस्टल, तालाब की मिट्टी आदि कई प्रकार की सकारात्मक वस्तुओं को रखा जाता है इस प्रकार शास्त्र विधि से बने कलश या मंजूषा को शुभ समय/मुहूर्त मे ब्रम्ह स्थान में विधि अनुसार स्थापित करने का विधान शास्त्र में बताया गया है ।

नोट: अधिक विस्तृत अध्ययन के लिए विश्वकर्मा प्रकाश, मयमत, मनसार, समरांगण सूत्रधार आदि ग्रंथों का सहारा लिया जा सकता है।
वास्तुविद गौरव गुप्ता
संस्थापक: वास्तु दुनिया ग्रुप.
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